Thursday, 15 March 2018

मेरे इश्क की चाय...

यादों की आग से तपी हुई है, ये मेरे इश्क की चाय
जाम ए नशेसी तलप है, ये मेरे इश्क की चाय
फूंक फूंककर पीना,
बरसों से उबल रही है
पत्ती पुरानी हैे,
जितना निचोडोगे उतनी रंग लायेगी,
ये मेरे इश्क की चाय

बहोत दूर से, पहाडों से, नदीयों की धाराओंसे
मजदूरों के कोमल हातों से
किसी पीठ के बोझ से,
गुजरते हुए बडे तकलीफ से
बस तेरे लबों को छूने आई है,
ये मेरे इश्क की चाय...

तारों को तनहाई में, तेरा साथ
हजारों की भीड में ,तेरा हाथ
ठंड में कपकपाते होठों को
रिश्तों में दोस्तो में, रूठों को
हर लब ओ लब्ज को मनाने आई है, ये मेरे इश्क की चाय


शिशे की प्याली में
बस कुछ बूँदों में बची है,
सूखी प्याली में कुछ दाने डाल दे,
फिर से रंग लायेगी
 ये मेरे इश्क की चाय

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